अठारह की सीमा
सभी जानते हैं
मन से ही नही
तन से भी , वो
नाजुक , अपरिपक्व है
सभी मानते हैं
फ़िर भी
सदियों से अब तक
हम उससे
व्याह रचाते आए
वो भी
बला की है संकोची
निचुड़ कर भी
हर हाल में
हमारा साथ निभाए
संगम का सुख दे
संतति नवीन
जन्माये
इक्कीसवी सदी में
विधि ने है सहेजा
फ़िर भी वो
शोषित है
उसे कौन बचाए ?
यही है
हमारे लोकतंत्र का हाल
अपरिपक्व है
फ़िर भी फल
देता जाए
हम अपराधी
उसे तब भी
कोसते हैं
वोट नही देते
उसे मजबूत
परिपक्व बनाने की
पहली शर्त में
स्वयम को कतई
नही ढालते
उसे ही नोचते हैं
वो जितना दे रहा है
उसमे भी कसर
खोजते हैं
हम विधि के ही नही
लोकतंत्र के भी
अपराधी हैं
चलिए होश संभाले
वोट डालें
लोकतंत्र को परिपक्व बनाये
ख़ुद संभले , देश को भी संभाले
परिपक्व नागरिक कहलाये
मित्रो , इससे निकले फल
हम सभी के सांझे हैं
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment