जब भी मै
विपरीत आकाश पर
खड़ा होता हूँ ,
ऐसा क्यों
महसूस होता है
जैसे मै
निज के
कही ज्यादा
पास खड़ा
होता हूँ ,
क्या यह केवल
एक आभास है ?
किसी मुगालते में खड़ा
मेरा भ्रम या
फिर मेरा
मेरे ही उपर उपजा
कोई तात्कालिक
अविश्वाश है,
या इन सबके परे
यही सच है
विरोधाभासों के
विलगाव विन्दु पर
खड़े हो
'उनके' होने की
यथार्थ को महसूस करना
उन्हें आत्मसात कर
जीवन पगडण्डी पर
पग धरना
आगे बढ़ना
क्या यही
'उनके' होने या
'उन्हें' मानने का
आगाज है,
यदि यही सच है
तो हम क्यों
विरोधाभासों को
मिटाने पर तुलें हैं ,
जिसके स्पर्श को
व्यवधान मान
शंकर
गंगा को दौड़ते हैं
पश्चाताप करते हैं
आस्तित्व स्पर्श
की पहुँच से
परे है
इस सच्चाई के
प्रकाश में नया
रूप धरते है
यही हम क्यों नही
सोचते
क्यों नही
वैविध्य के
कोंख में छिपे
एकात्म को खोजते,
सभी को निजता
प्यारी है
निजता का नैकट्य
मनोरम है
सुहावनी है
उसके करीब
होने का आभास भी
जागतिक हर खुशी
से न्यारी है
अहो! प्रिये
चलो हम
वैविध्य पी लें
पहचान की संकट
के दौर में
भीड़ में समाजायें
अपनी पहचान खो लें
एक हो लें
Wednesday, December 10, 2008
हम लोकतंत्र के अपराधी
अठारह की सीमा
सभी जानते हैं
मन से ही नही
तन से भी , वो
नाजुक , अपरिपक्व है
सभी मानते हैं
फ़िर भी
सदियों से अब तक
हम उससे
व्याह रचाते आए
वो भी
बला की है संकोची
निचुड़ कर भी
हर हाल में
हमारा साथ निभाए
संगम का सुख दे
संतति नवीन
जन्माये
इक्कीसवी सदी में
विधि ने है सहेजा
फ़िर भी वो
शोषित है
उसे कौन बचाए ?
यही है
हमारे लोकतंत्र का हाल
अपरिपक्व है
फ़िर भी फल
देता जाए
हम अपराधी
उसे तब भी
कोसते हैं
वोट नही देते
उसे मजबूत
परिपक्व बनाने की
पहली शर्त में
स्वयम को कतई
नही ढालते
उसे ही नोचते हैं
वो जितना दे रहा है
उसमे भी कसर
खोजते हैं
हम विधि के ही नही
लोकतंत्र के भी
अपराधी हैं
चलिए होश संभाले
वोट डालें
लोकतंत्र को परिपक्व बनाये
ख़ुद संभले , देश को भी संभाले
परिपक्व नागरिक कहलाये
मित्रो , इससे निकले फल
हम सभी के सांझे हैं
सभी जानते हैं
मन से ही नही
तन से भी , वो
नाजुक , अपरिपक्व है
सभी मानते हैं
फ़िर भी
सदियों से अब तक
हम उससे
व्याह रचाते आए
वो भी
बला की है संकोची
निचुड़ कर भी
हर हाल में
हमारा साथ निभाए
संगम का सुख दे
संतति नवीन
जन्माये
इक्कीसवी सदी में
विधि ने है सहेजा
फ़िर भी वो
शोषित है
उसे कौन बचाए ?
यही है
हमारे लोकतंत्र का हाल
अपरिपक्व है
फ़िर भी फल
देता जाए
हम अपराधी
उसे तब भी
कोसते हैं
वोट नही देते
उसे मजबूत
परिपक्व बनाने की
पहली शर्त में
स्वयम को कतई
नही ढालते
उसे ही नोचते हैं
वो जितना दे रहा है
उसमे भी कसर
खोजते हैं
हम विधि के ही नही
लोकतंत्र के भी
अपराधी हैं
चलिए होश संभाले
वोट डालें
लोकतंत्र को परिपक्व बनाये
ख़ुद संभले , देश को भी संभाले
परिपक्व नागरिक कहलाये
मित्रो , इससे निकले फल
हम सभी के सांझे हैं
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